क्रिकेट कार्निवाल में शाहरूख खान के कोलकाता नाइट राइडर्स टीम में अन्तत: रवीन्द्रनाथ और महाबली खली। नीली क्रान्ति के विपणन में बेशर्म सांस्कृतिक संक्रमण का अद्भुत तामाशा। तमाशबीन पश्चिम बंगीय पोंगापंथी मार्क्सवादी पूंजीवादी सवर्ण बांग्ला राष्ट्रीयता।
पलाश विश्वास
अपने जाने-माने अंदाज में कोलकातावासियों का अपनापन और प्यार पाने के लिए सुपरस्टार व आईपीएल कोलकाता टीम के मालिक शाहरुख खान ने गुरुवार को खुद को साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोर का जबरदस्त प्रशंसक बताया। ईडन गार्डन में मैच के लिए शाम को शहर के हवाई अड्डे पर उतरते ही शाहरुख ने कहा, “मैं रवीन्द्र नाथ टैगोर का जबरदस्त प्रशंसक हूं। मुझे बंगाली नहीं आती लेकिन मैंने उनकी सभी अनुवादित कविताएं पढ़ी हैं।
रवीन्द्रनाथ का भूमंडलीय बाजार में कारपोरेट इस्तेमाल कोई नयी बात नहीं है। रवीन्द्र नोबेल पदक और रवीन्द्र विरासत गंवाने वाले कविगुरु के सपनों की तपस्याभूमि विश्वभारती इस आपाधापी में सबसे आगे है। पोंगापंथियों ने वोटबैंक समीकरण और मूलनिवासी सफाया एजंडा के तहत अंधाधुंध शहरीकरण और पूंजीवादी विकास में रवीन्द्र का भरपूर इस्तेमाल किया। पाक फौजी हुकूमत ने भारतीय राष्ट्रीयता के जनक और विश्व बन्धुत्व के प्रवक्ता जिस कवि पर प्रतिबन्ध लगाकर बांग्ला भाषा आन्दोलन और बांग्लादेश मुक्तिसंग्राम की जमीन तैयार की, जिस कवि के रोमांटिक गीत आमार बांग्ला आमि तोमाय भालोबासि होंठों पर सजाकर तीस लाख आजादी के दीवाने बंगालियों ने, हिन्दुओं और मुसलमानों ले विभाजन और मजहब के नाम पर दो राष्ट्र सिद्धान्त को खारिज करके हंसते हंसते शहादते दी, लाखों मां बहनों ने आजादी की कीमत बतौर अपनी अस्मत तक दांव पर लगा दिया, हमलावरो के सामूहिक बलात्कार और उनके नाजायज गर्भ को झेल लिया, उस रवीन्द्रनाथ का इस्तेमाल मूलनिवासी सफाया अभियान में हो रहा है। बेशर्म बुद्ध बुश प्रणव तिकड़ी ने साम्राज्यवादी, सामन्ती पूंजीवादी मनुस्मृति व्यवस्थ और रंगभेदी श्वेत नवउदारवादी सार्वभौम बाजार में खड़ा कर दिया रवीन्द्रनाथ को। जलेस प्रलेस ने प्रेमचंद को पूंजीवादी विकास का पक्षधर साबित किया तो उन्ही की पोंगापंथी पश्चिम पंग सरकार ने रवीन्द्र जयंती पर सरकारी विज्ञापन जारी करते हुए रवीन्द्रनाथ को शहरीकरण. औद्यौगीकरण, सेज, कैमिकल हब और परमाणु ऊर्जी का प्रवक्ता बना दिया है। तो शाहरूख खान ने अप्रवासी कारपोरेट सवर्ण सत्तावर्ग के अंधाधुंध मुनाफे के लिए रवीन्द्रनाथ को भुनाया तो क्या गुनाह किया?
खासकर तब जबकि लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी की अगुवाई में शान्तिनिकेतन अब प्रोमोटरों बिल्दरों माफिया के हवाले है? आनन्दबाजार प्रकाशन सूह ने रवीन्द्र को नीली क्रानित में समाहित करने की मुहिम छेड़कर बांग्ला भाष का बतौर वेश्यावृत्ति इस्तेमाल जारी रखा है अपने गुलाम संस्कृतिकर्मियों के जरिए। जिनमें कोई साहित्य अकादमी अध्यक्ष है तो कोई प्रतिरोध आन्दोलन का मसीहा। इस कार्रवाई को सत्ता और सत्तावर्ग का पूरा समर्थन है तो शाहरुख की आलोचना किस आधार पर?
रवीन्द्र के दलित विमर्श पर बंगाल में चर्ची नहीं होती। हालांकि अस्पृश्.ता के विरुद्ध और बौद्धधर्म के पक्ष में लिख नृत्य नाटिका चंडालिनी का मंचन सबसे ज्याद होता है। नोबेल पुरस्कार पाने से पहले तक अस्पृश्य थे रवीन्द्रनाथ और उन्हे पुरी के मन्दिर में प्रवे नहीं करने दिया गया। गीतांजलि अन्त्यज सूफी संत दर्शन बाउल संस्कृति से प्रेरित है और अछूतों के पक्ष में रवीन्द्रनाथ ने राशियार चिठि जैसी रचनाएं तक लिखीं। रथेर रशि में उन्होंन बाकायदा अस्पृश्य मूलनिवासियों के नेतृत्व में परिवर्तन की बात की। पर नोबेल पदकधारी मूलनिवासियों के सबसे महान कवि पर सवर्ण सत्तावर्ग ने ऐसा कब्जा जमाया कि उनके दलित विमर्श पर चर्चा ही शुरु नहीं हुई। हिन्दी में भी ऐसे सवर्ण मसीहा मौजूद हैं जो साहि्य विरासत का इस्तेमाल सवर्म हित में करते हैं और साहित्य अकादमी, सरकार, हिंदी प्रसार से लेकर जसम जलेस तक में अग्रगामी हैं। ऐसे ही एक महान मसीहा कवि केदार नाथ सिंह और उनके पिट्ठू प्रकाशक हरिश्चन्द्र पांडे मेरी पुस्तक रवींन्द्र का दलित विमर्श की पांडुलिपि वर्षों से दबाये हुए हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को मशहूर चित्रकार एमएफ हुसैन को राहत देते हुए उनके खिलाफ हिंदू देवियों के अश्लील पेंटिंग्स बनाकर धार्मिक भावना को चोट पहुंचाने के आरोप में दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया है। जस्टिस संजय किशन कौल ने मामले को आधारहीन बताते हुए कहा कि यह भिन्न अभिमत का मामला है, जो आपराधिक मामले का आधार नहीं बन सकता है।
वर्ष 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के प्रति एकजुटता दिखाते हुए फ्रांस के लेखक और कार्यकर्ता डोमिनिक लैपियर ने कहा है कि यहां के प्रभावित इलाकों में बच्चे जहरीला पानी पी रहे हैं। राजधानी के जंतर-मंतर में रविवार शाम को भोपाल गैस त्रासदी के प्रभावितों के प्रदर्शन के दौरान लैपियर ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से गुजारिश की कि इनकी समस्याओं को सुनें।
ईडन गार्डन में मैच के लिए शाम को शहर के हवाई अड्डे पर उतरते ही शाहरुख ने कहा, “मैं रवीन्द्र नाथ टैगोर का जबरदस्त प्रशंसक हूं। मुझे बंगाली नहीं आती लेकिन मैंने उनकी सभी अनुवादित कविताएं पढ़ी हैं।”
बांग्ला के सुप्रसिद्ध साहित्यकार गुरुदेव टैगोर की प्रशंसा करते हुए शाहरुख ने कहा, “टैगोर विश्व साहित्य के सार-संग्रह हैं। मैं जब भी तनाव में होता हूं, उनके गीत व कविताएं मुझे प्रेरित करती हैं।”
शाहरुख ने टाला संगीत कार्यक्रम
गुरुदेव के जन्म दिन के खास मौके पर अपनी टीम का टैगोर की जन्म स्थली “बंगाल” में मैच खेलने को उन्होंने टीम के लिए गौरव का विषय बताया।
आज गुरुदेव की जयंती है और आज के दिन शाहरुख के कार्यक्रम को पश्चिम बंगाल सरकार ने यह कह कर अनुमति नहीं दी थी कि यह उनकी संस्कृति के अनुरूप नहीं।
बाद में कोलकातावासियों की संवेदना को ध्यान में रखते हुए शाहरुख ने खेल से पहले 10 मिनट के अपने कार्यक्रम को रद्द कर दिया।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर (बांग्ला: রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর रोबिन्द्रोनाथ् ठाकुर्) (7 मई, 1861 – 7 अगस्त, 1941) को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है, विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता हैं। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगद्रष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति है। उन्होने भारत के राष्ट्रीय गान जन गण मन और बांग्लादेश के राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला की रचना की।
इंडियन प्रीमियर लीग में कोलकाता नाइट राइडर्स और बेंगलूर रॉयल चैलेंजर्स के बीच होने वाला मैच बारिश के कारण निर्धारित समय पर शुरू नहीं हो सका है। दोनों ही टीमों का टूर्नामेंट में अब तक का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। कोलकाता ने छह मैचों में 2 में जीत दर्ज की है जबकि चार में उसे हार का सामना करना पड़ा है वहीं बेंगलूर को सात मैचों में दो में जीत व पांच में हार मिली है। कोलकाता के पुलिस कमिश्नर गौतम मोहन चक्रवर्ती ने मंगलवार को कहा कि ईडन गार्डंस में गुरुवार को कोलकाता नाइट राइडर्स और बेंगलुरु रॉयल चैलेंजर्स के बीच होने वाले आईपीएल के मैच के पहले फिल्म अभिनेता शाहरुख खान का कार्यक्रम नहीं होगा। उन्होंने कहा रेड चिल्ली इंटरटेनमेंट ने उन्हें बताया कि नाइट राइडर्स टीम के मालिक शाहरुख इस महत्वपूर्ण ट्वेंटी-20 मैच के पहले अपना कार्यक्रम पेश नहीं करेंगे।
महान साहित्यकार तथा नोबेल पुरस्कार विजेता रविन्द्रनाथ टैगोर का आठ मई को जन्मदिन है। पश्चिम बंगाल के खेल मंत्री सुभाष चक्रवर्ती ने बंगाल क्रिकेट असोसिएशन (कैब) से कहा है कि वह शाहरुख खान के शो के आयोजकों को स्वर्गीय टैगोर के जन्मदिन की अहमियत के बारे में बताएं।
उन्होंने कहा, ‘उस पावन दिन कोई व्यक्ति ऐसा कार्यक्रम आखिर कैसे कर सकता है जो हमारी संस्कृति और परंपराओं से मेल नहीं खाता।’ गौरतलब है कि बंगाल के लोग हर ‘पचीशे बैशाख’ के दिन कवि गुरु रविन्द्रनाथ टैगोर का जन्मदिन बहुत उत्साह तथा हर्षोल्लास से मनाते हैं। अगर शो का आयोजन बहुत जरूरी है तो कैब को आयोजकों से इस कार्यक्रम के स्थान में बदलाव करने के लिए कहना चाहिए। ‘
चक्रवर्ती का यह बयान ऐसे समय आया है जब शो की मैनेजमेंट कंपनी रेड चिलीज एंटरटेनमेंट, पुलिस और कैब शाहरुख इसके लिए ईडन गार्डन्स में सही जगह के बारे में विचार-विमर्श कर रहे हैं।
जीवन
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म सन 1861 में कलकत्ता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। then बचपन से ही उनका कविता, छन्द और भाषा में अद्भूत प्रतिभा का आभास लोगों को मिलने लगा। देश और विदेश के सारे साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को वे आहरण करके अपने अन्दर सिमट लिए थे। उनके पिता ब्राह्म धर्म के होने के कारण रवीन्द्रनाथ भी ब्राह्म कहलाते थे। पर अपने रचनाओं व कर्म के द्वारा उन्होने सनातन धर्म को भी रहा दी और आगे बढ़ाया।
मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनके रचनाओ के अन्दर वे अलग अलग रूपों में उभर आये। साहित्य का शायद ही ऐसा कोइ शाखा है, जिनमें उनकी सृष्टि न हो – कविता, गान, कथा, उपन्यास, नाटक, प्रबन्ध, शिल्पकला – सभी मे।
उनके कविताओं अलग अलग पुस्तकों में प्रकाशित हुई – गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, शिशु भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि। एक आध पुस्तको फिर उन्होने अंग्रजी में अनुवाद करने लगे। अब तक तो उनके प्रतिभा बंगाली समाज में ही समादृत हुआ था, पर अनुवाद होते ही वह विश्व को भी दिखने लगा।
[संपादित करें] सम्मान
उन्हे साहित्य के लिये 1915 का नोबेल पुरस्कार मिला।
[संपादित करें] रवीन्द्र साहित्य
गीताञ्जलि से एक लोकप्रिय रचनाः
राज्यपाल की गांधीगिरी पर वाम हुआ लाल
Archive for April 26th, 2007
बंगाल में पोंगापंथ
वाकई देश में सीपीएम किस तरह से मार्क्स का नाम लेकर धार्मिक ब्रह्मणों और आर्थिक ब्राह्मणों (अमेरिकनों) के लिए लाल कालीन बिछाये हुए है, यह देखने लायक है. हंस के मार्च अंक से साभार
पलाश विश्वास
बंगाल के शरतचन्द्रीय बंकिमचन्द्रीय उपन्यासों से हिंदी जगत भली-भांति परिचित है, जहां कुलीन ब्राह्मण जमींदार परिवारों की गौरवगाथाएं लिपिबद्ध हैं. महाश्वेता देवी समेत आधुनिक बांग्ला गद्य साहित्य में स्त्राी अस्मिता व उसकी देहमुक्ति का विमर्श और आदिवासी जीवन यंत्राणा व संघर्षों की सशक्त प्रस्तुति के बावजूद दलितों की उपस्थिति नगण्य है. हिंदी, मराठी, पंजाबी, तमिल, कन्नड़ और तेलुगू भाषाओं की तरह बांग्ला में दलित साहित्य आंदोलन की कोई पहचान नहीं बन पाई है और न ही कोई महत्त्वपूर्ण दलित आत्मकथा सामने आई है, बेबी हाल्दार के आलोआंधारि जैसे अपवादों को छोड़कर. आलो आंधारि का भी हिंदी अनुवाद पहले छपा, मूल बांग्ला आत्मकथा बाद में आयी.
यह ब्राह्मणत्व का प्रबल प्रताप ही है कि १९४७ में भारत विभाजन के बाद हुए बहुसंख्य जनसंख्या स्थानांतरण के तहत पंजाब से आनेवाले दंगापीड़ितों को शरणार्थी मानकर उनके पुनर्वास को राष्ट्रीय दायित्व मानते हुए युद्धस्तर पर पुनर्वास का काम पूरा किया गया. जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरू और आधुनिक बंगाल के निर्माता तत्कालीन मुख्यमंत्राी विधानचंद्र राय ने पूर्वी बंगाल के दलित आंदोलन के आधार क्षेत्रा जैशोर, खुलना, फरीदपुर, बरिशाल से लेकर चटगांव, कलकत्तिया सवर्ण वर्चस्व और ब्राह्मणवादी एकाधिकार को चुनौती देने वाली कोई ताकत नहीं है. भारत भर में ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक पिछड़े वर्ग की जनसंख्या चालीस प्रतिशत से ज्य़ादा है. भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बाकी देश में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का जोरदार समर्थन करती है. मलाईदार तबके को प्रोन्नति से अलग रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में ओबीसी कोर ग्रुप की बैठक हुई जिसमें त्रिापुरा के समाज कल्याण मंत्राी कवि अनिल सरकार, जो माकपा की हैदराबाद कांग्रेस में गठित दलित सेल में बंगाल वाममोर्चा चेयरमैन विमान बसु के साथ महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं, शामिल हुए. पार्टी का दलित एजेंडा भी बसु और सरकार ने तय किया. इन्हीं अनिल सरकार ने उस बैठक में दलितों और पिछड़ों के आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमा ५० फ़ीसदी से बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की मांग उठाई, मलाईदार तबक़े को प्रोन्नति से अलग रखने के फ़ैसले की प्रतिक्रिया में उन्होंने सवर्ण मलाईदार तबकेश् को चिन्हित करके उन्हें भी प्रोन्नति के अवसरों से वंचित रखने की सिफ़ारिश की है. उनका दावा है कि त्रिापुरा में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों का आरक्षण लागू किया जा चुका है.
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में अभी तक पिछड़ी जातियों की पहचान का काम पूरा नहीं हुआ है, आरक्षण तो दूर. अनिल सरकार कहते हैं कि पचास फ़ीसद आरक्षण के बावजूद सिर्फ दस प्रतिशत नौकरियां ही दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को मिलती हैं, नब्बे फ़ीसदी नौकरियों पर सवर्ण काबिज़ हैं.
पश्चिम बंगाल में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को प्रोन्नति के अवसर तो सिरे से नहीं हैं. आरक्षित पदों पर रिक्तियां अनंत हैं पर योग्य प्रार्थी न मिलने की वजह दिखाकर अमूमन आरक्षित पदों को सामान्य बनाना आम है. गैर बंगाली नागरिकों को तो किसी भी क़ीमत पर जाति प्रमाण-पत्रा नहीं ही मिलता पर अब दलितों, आदिवासियों की संतानों को भी जाति प्रमाण-पत्रा जारी नहीं किए जाते.
सबसे सदमा पहुंचाने वाली बात यह है कि बाक़ी देश में जहां अखब़ार और मीडिया गैर-ब्राह्मणों की खब़रों को प्रमुखता देते हैं, वहीं बंगाल में ब्राह्मणवादी मीडिया और अखब़ार दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और शरणार्थियों के बारे में एक पंक्ति की खब़र तक नहीं छापते. जबकि कमज़ोर तबकेश् की आवाज़ उठाने वाली माकपा बंगाल में ३५ सालों से सत्ता में हैं.
पिछले दिनों सुभाष चक्रवर्ती के तारापीठ जाकर तारा मां की पूजा पर पार्टी पोलित ब्यूरो, केंद्रीय समिति, राज्य वाम मोर्चा से लेकर मीडिया में काफ़ी बवेला मचा. पार्टी, विचारधारा और धर्म पर वैचारिक बहस छिड़ गई. प्रतिक्रिया में सुभाष चक्रवर्ती ने कहा, ‘पहले मैं हिंदू हूं और फिर ब्राह्मण`. वे दुर्गोत्सव में १२० पंडालों के संरक्षक थे. विवाद से चिढ़कर उन्होंने परिवहनकर्मियों को धूमधाम से विश्वकर्ता पूजा मनाने के निर्देश दिए. हक़ीक़त यह है कि सुभाष चक्रवर्ती और उनके चार भाइयों ने जनेऊ धारण नहीं किया. ब्राह्मण समाज ने आज़ादी से पहले उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था, वे एकमात्रा सवर्ण मंत्राी हैं जो दलितों का साथ देते हैं. पर वे अपनी पहचान और संस्कृति के यथार्थ पर जोर देते हैं. ज़मीनी जड़ें होने के कारण उनका जनाधार मजबूत है. सुभाष चक्रवर्ती के इस विवादास्पद बयान पर बंगाल में धर्म पर बहस तो छिड़ी, मनुस्मृति और उसके अभिशाप पर चर्चा तक नहीं हुई, चक्रवर्ती वाम आंदोलन के बंगाल, त्रिापुरा और केरल तक सिमट जाने की वजह भारतीय संस्कृति और लोक से अलगाव को मानते हैं.
बाक़ी भारत में दलित आंदोलन से अलगाव भी माकपा को राष्ट्रीय नहीं बनाती, यह पार्टी के हैदराबाद कांग्रेस में मानकर बाक़ायदा आज़ादी के इतने सालों बाद दलित एजेंडा भी पास किया गया पर अपने चरित्रा में आज भी माकपा और सारे वामपंथी दल दलित विरोधी हैं. इसीलिए दिनों दिन बंगाल में ब्राह्मणवाद की जडें मजबूत हो रही हैं. इसी हक़ीक़त की ओर बागी मंत्राी सुभाष चक्रवर्ती ने उंगली उठाई है. पूंजीवाद विकास के लिए अधाधुंध, ज़मीन अधिग्रहण के शिकार हो रहे हैं दलित पिछड़े आदिवासी और अल्पसंख्यक, पर इस मुद्दे पर तमाम हो हल्ले के बावजूद बंगाल में दलितों के अधिकार को लेकर लड़ने वाली कोई ताकत कहीं नहीं है.
इधर के वर्षों में बचे-खुचे दलित आंदोलन के तहत खा़सकर कोलकाता और आस-पास विवाह, श्राद्ध जैसे संस्कारों में ब्राह्मणों का बहिष्कार होने लगा है. श्राद्ध की बजाय स्मृति-सभाएं होने लगी है, कई बरस पहले यादवपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी करने वाले एक दलित ने अपढ़ पुरोहित से पिता का श्राद्ध कराने की बजाय कृष्णनगर के पास अपने गांव में स्मृति सभा का आयोजन किया तो पूरे इलाक़े में तनाव फैल गया.
ताजा घटना सुभाष चक्रवर्ती के ब्राह्मणत्व के विवाद के बाद की है.
सुंदरवन इलाक़े में दलितों-पिछड़ों की आबादी ज्य़ादा रही है. इसी इलाक़े में दक्षिण २४ परगना जिले के गोसाबा थाना अंतर्गत सातजेलिया लाक्स़बागान ग्लासखाली गांव के निवासी मदन मोहन मंडल स्थानीय लाक्सबागान प्राथमिक विद्यालय के अवैतनिक शिक्षक हैं. पर चूंकि उन्होंने पुरोहित बुलाकर पिता का श्राद्ध नहीं किया और न ही मृत्युभोज दिया इसलिए पिछले चार महीने से उनका सामाजिक बहिष्कार चल रहा हैं. वे अपवित्रा और अछूत हो गए हैं और पिछले चार महीने से वे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं.
मदनमोहन मंडल के इस स्कूल के विद्यार्थी ज्य़ादातर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के बच्चे हैं. बतौर शिक्षक छात्रा-छात्रााओं में मदनमोहन बाबू अत्यंत लोकप्रिय हैं, पर पवित्रा ब्राह्मणवाद के पुण्य प्रताप से शनि की दशा है उन पर. पिता की मृत्यु पर बंगाली रिवाज़ के मुताबिक सफ़ेद थान कपड़े नहीं पहने उन्होंने. हविष्य अन्न नहीं खाया. सामान्य भोजन किया. नंगे पांव नहीं चले. और न ही पुरोहित का विधान लिया या श्राद्ध कराया.
ब्राह्मणवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस दलित बहुल इलाक़े में, ब्राह्मणों ने नहीं, दलितों और पिछड़ों ने उनके स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी. प्रधानाचार्य शिवपद मंडल का कहना है, ”मदनमोहन बाबू सूतक (अशौच अवस्था में) में हैं. वे स्कूल आएंगे तो यह नन्हें बच्चों के लिए अशुभ होगा. मदनमोहन बाबू को फ़तवा जारी किया गया है कि ब्राह्मणों से विधान लेकर पुरोहित बुलाकर पहले पितृश्राद्ध कराएं, फिर स्कूल आएं.
मदनमोहन मंडल ने हार नहीं मानी और विद्यालय निरीक्षक की शरण में चले गए. उन्होंने लाक्सबागान के पड़ोसी गांव बनखाली प्राथमिक विद्यालय में अपना तबादला करवा लिया पर इस स्कूल में भी उनके प्रवेशाधिकार पर रोक लग गई.
इलाक़े के मातबर लाहिड़ीपुर ग्राम पंचायत के पूर्व सदस्य व वामपंथी आरएसपी के नेता श्रीकांत मंडल का सवाल है, ”जो व्यक्ति अपने पिता का श्राद्ध नहीं करता, वह बच्चों को क्या शिक्षा देगा.“ गौरतलब है कि सुंदरवन इलाके में माकपा के अलावा आरएसपी का असर ज्य़ादा है. अभिभावकों की ओर से कन्हाई सरदार का कहना है, ”जो शिक्षक गीता, शास्त्रा नहीं मानता, उसके यहां बच्चों को भेजने के बजाय उन्हें अपढ़ बनाए रखना ही बेहतर है.“
आखिऱकार अपने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ़ मदनमोहन मंडल गोसाबा थाना पहुंच गए, पर पुलिस ने रपट लिखने से मना कर दिया. मदनमोहन बाबू ने गोसाबा अंचल के विद्यालय निरीक्षक ब्रजेन मंडल से लिखित शिकायत की. ब्रजेन बाबू ने खुद शिक्षक संगठन के प्रतिनिधियों के साथ मौक़े पर गए, पर ब्राह्मणवादी कर्मकांड विरोधी शिक्षक का सामाजिक बहिष्कार खत़्म नहीं हुआ.
मदनमोहन मंडल आरएसपी के कृषक आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं. पर स्थानीय आरएसपी विधायक चित्तरंजन मंडल ने मदनमोहन बाबू के आचरण को ‘अशोभनीय` करार दिया.
दक्षिण चौबीस परगना के वामपंथी शिक्षक संगठन के सभापति अशोक बंद्योपाध्याय का कहना है, ”अगर कोई संस्कार तोड़ना चाहे तो उनका स्वागत है, पर यह देखना होगा कि उसकी इस कार्रवाई को स्थानीय लोग किस रूप में लेते हैं.“ अशोक बाबू ने मदनमोहन मंडल के मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.
मदनमोहन बाबू अब भी स्कूल नहीं जा पाते, वे गोसाबा स्थित अपर विद्यालय निरीक्षक के दफ्त़र में हाज़िरी लगाकर अपनी नौकरी बचा रहे हैं. पर वे किसी क़ीमत पर पितृश्राद्ध के लिए तैयार नहीं हैं.
माकपा के बागी मंत्राी के ब्राह्मणत्व पर विचारधारा का हव्वा खड़ा करने वाले तमाम लोग परिदृश्य से गायब हैं.
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4425990/

कोलकाता। पिछले दो महीने से बिजली की आपूर्ति बंद होने से परेशान आम नागरिकों का साथ देने के लिए पश्चिम बंगाल के राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने राजभवन में भी स्वैच्छिक बिजली आपूर्ति बंद करने का आदेश दिया है। इस आदेश का अनुपालन बुधवार से ही राजभवन में किया गया और दो घंटे के लिए बिजली बंद कर दी गई। इस दौरान बल्ब, पंखे, एयर कंडीशनर आदि बिल्कुल बंद रहे। यहां तक कि लिफ्ट का परिचालन भी नहीं हुआ। हालांकि, राज्यपाल द्वारा अपनाया गया गांधीगिरी का यह तरीका सत्तारूढ़ वाम नेताओं को नागवार गुजरा है और वे इस निर्णय को लेकर काफी आक्रोश में आ गए हैं।
राज्यपाल के इस निर्णय से वाम नेता इस कदर नाराज हुए कि उन्होंने राज्यपाल के पद के औचित्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। नाराज नेताओं ने जोर देकर कहा कि इस बात पर बहस होनी चाहिए कि क्या वास्तव में देश को राज्यपालों की आवश्यकता है।
राज्यपाल के स्वैच्छिक बिजली बंद के आदेश के तहत आज से राजभवन में दोपहर 1.30 बजे से 2.30 बजे तक पंखे और लिफ्ट बंद रहेगी। राजभवन के प्रवक्ता ने बताया कि इसी तरह एक अन्य स्वैच्छिक कदम के रूप में शाम को छह बजे से सात बजे तक बिजली बंद की जाएगी। उन्होंने बताया कि जरूरत होने पर राज्यपाल के निर्णय की समीक्षा की जाएगी। ऐसे में गर्मी के इस मौसम में राज्यपाल गांधी और उनका समूचा अमला आज से आम जनता को दरपेश पावर कट और बिजली की अन्य समस्याओं के मद्देनजर अब हर दिन दो घंटे बिना बिजली के पसीना बहाएंगे।
राज्यपाल के निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए राज्य के बिजली मंत्री मृणाल बैनर्जी ने कहा कि यह निर्णय ऐसे समय में आया है जबकि पिछले दस दिनों में बिजली की समस्या कम हो रही है। उन्होंने कहा कि यदि एक व्यक्ति एक समय खाना नहीं खाता क्योंकि खाद्यान्न की समस्या है तो ऐसे में हम क्या कर सकते हैं।
इस संदर्भ में प्रतिक्रिया स्वरूप वरिष्ठ सीपीआई नेता बिमान बोस ने कहा कि राज्यपाल के उक्त निर्णय व उनके वक्तव्य को लेकर वह ज्यादा कुछ टिप्पणी नहीं करेंगे लेकिन मेरा मानना है कि आजादी के साठ साल के बाद पूरे देश में इस बात पर चर्चा व बहस होनी चाहिए कि क्या राज्यपाल का पद एक जरूरी आवश्यकता है।
राज्यपाल का उक्त निर्णय ठीक एक महीने बाद आया है जब उन्होंने नंदीग्राम की स्थिति नियंत्रित न होने को लेकर राज्य सरकार की घोर आलोचना की थी। मेट्रो शहरों में बिजली आपूर्ति की बुरी हालत के संदर्भ में राज्यपाल का यह निर्णय राज्य की वाम सरकार के लिए परेशानी का सबब बन गया है। इसके विरोध में वाम नेता काफी उबल उठे हैं और राज्यपाल का पद और उसकी भूमिका पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।
उधर, सीपीआई-एम के जनरल सेक्रेटरी प्रकाश करात ने मदुरै में कहा है कि यदि कोई व्यक्ति बिजली बंद करके बिजली बचत को तरजीह दे रहा है तो यह एक अच्छा कदम है। हमें इस बात पर आपत्तिनहीं होना चाहिए।
देश में राज्यपालों की आवश्यकता है या नहीं, इस पर बहस कराए जाने के एक सवाल के जवाब में करात ने कहा कि यह एक अलग विषय व मुद्दा है। लेकिन इस बात की आवश्यकता जरूर है कि राज्यपाल की भूमिका को फिर से परिभाषित किया जाना चाहिए।
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अर्जुन सिंह को सच्चे रामभक्त के रूप में पेश करने वाली किताब ‘मोहिं कहां विश्राम’ में उनकी लिखी एक चिट्ठी प्रकाशित की गई है। उन्होंने दिल का ऑपरेशन होने से पहले यह चिट्ठी भगवान राम, रहीम और ईसा मसीह को संबोधित करते हुए लिखा और अपने अंतर्मन की भावनाएं इसमें जाहिर की थीं। यह वह समय था, जब राम जन्म भूमि आंदोलन अपने उफान पर था।
किताब का विमोचन शुक्रवार को प्रेजिडेंट प्रतिभा पाटिल करेंगी। यह किताब सबके सामने आने से पहले ही विवादों में घिर गई लगती है। इस किताब में भगवान राम, अयोध्या जैसे मुद्दों पर अर्जुन सिंह की बेबाक बयानी के अलावा ऐसी कई चीजें हैं, जो विवाद का सबब बनेंगी। इसी किताब में एक इंटरव्यू में अर्जुन सिंह ने कांग्रेस में फैसले लेने की प्रक्रिया में खोट आने की बात मानी है।
7 May 2008, 1733 hrs IST
अर्जुन सिंह का यह रामभक्त चेहरा उनके ऊपर लिखी गई किताब ‘मोहि कहां विश्राम’ में सामने आया है। किताब के संपादक कन्हैया लाल नंदन को दिए इंटरव्यू में मानव संसाधन विकास मंत्री ने सेतु समुद्रम के बारे में पूछने पर कहा, ‘भगवान राम के बारे में कोई भी विवाद न कोई आधार पा सकता है और न ही उसका कोई औचित्य ही है। यह हमारे लिए आस्था का प्रश्न है। इस पर दूसरा कोई क्या सोचता है इस पर विचार ही क्यों किया जाए।’
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे के लिए उन्होंने अफसरों की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि राम सेतु के बारे में इतना ही कह देना काफी था कि इस विषय पर ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। उल्टे कह दिया गया कि उसका इतिहास नहीं है।
अर्जुन सिंह पर लिखी गई किताब में उनकी राम भक्ति स्पष्ट करते हुए उनका चित्र प्रकाशित किया गया है जिसके नीचे चौपाई लिखी है, ‘रामकाज कीन्हें बिना मोहि कहां विश्राम।’
आस्था के प्रश्न पर उन्होंने कहा, ‘आस्थाओं के सही मूल्य को जो समझेगा वह उसके साथ खिलावाड़ नहीं करेगा। जो आस्थाओं के इस्तेमाल का हुनर जानता है, वही खिलवाड़ करता है। यहीं पर मेरा मतभेद है। इससे कोई खुश हो या नाराज मुझे फर्क नहीं पड़ता। जो मेरा ष्टिकोण है मैं उसी से चलता हूं।
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